मंगलवार, 1 मई 2012

बेटी को पराई ...












आपने देखा होगा,
आपने जाना होगा,
दिल ने इजाजत दी हो,
या नहीं,
पर आपने माना होगा ।
रिवाज के नाम पर,
रस्‍मों की दुहाई देते लोग ।
लहू के नाम पर,
रिश्‍तों  की दुहाई देते लोग ।

जन्‍म देने वाली,
होती एक मां
फिर भी बेटे को,
कुल का दीपक,
बेटी को पराई ही,
सदा कहते लोग.... 


थाम के उंगली चलना छोड़ दे ... 

उसे लिखना तो नहीं आता
पर वो अश्‍कों की नमी के बीच
हिचकियों के साये में
अटक - अटक कर बोल रही थी
इन शब्‍दों को
मन द्रवित हो गया ...
माँ
मुझे तुम
खेलने को खिलौना मत दो
पर मेरे मन को
यह मत कहो कि
वह खिलौना देखकर
मचलना छोड़ दे  ...
मेरे मन का बच्‍चा अभी भी
तुम्‍हारे साये में चलता है
उससे ये मत कहो
कि वो तुम्‍हारी
थाम के उंगली चलना छोड़ दे ...!!!

मंगलवार, 13 मार्च 2012

बेटियों को नेमत समझें ....

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
कोई बिटिया मां के आंचल में छिपी कोई मेरे कांधे चढ़ी,
मैं इनकी हंसी के बीच यूं सदा हंसता खिलखिलाता रहा ।

खबर पढ़ता कोई बुरी अखबार में या सुनता कहीं तो
मैं रह-रह के वक्‍त और हालात पर तिलमिलाता रहा ।

कोई मासूम जान आने से पहले धरा पर कत्‍ल होती, 
तब-तब कोई आंसू मेरी आंख में झिलमिलाता रहा ।

निशाने पे जाने कितनी और ज़ाने होंगी अभी यहां,
बेबसी पर उनकी मेरा अन्‍तर्मन बिलबिलाता रहा ।

इरादों को इनके नेक नीयत बख्‍श दे या खुदा अब तो,
बेटियों को नेमत समझें मन में ये इल्‍तज़ालाता रहा ।

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

विश्‍वास ..... !!!













विश्‍वास का मंत्र
बचपन से ही मेरे कानों में
पढ़ा था मॉं ने
जब भी उछालते थे बाबा
हवा में मुझे
मैं बिना भय के मुस्‍कराते हुए 
इंतजार करती  कब वो मुझे
अपनी हथेलियों में थाम लेंगे ...
देखा था मेले में मैने
उस छोटी लड़की को जो
पतली सी रस्‍सी पर आगे बढ़ते हुए
विश्‍वास के साथ हर कदम को
मजबूती से रखते हुए  ....
यह विश्‍वास शब्‍द
कितना छोटा सा है
किसी पर हो जाए तो फिर
आसानी से नहीं टूटता
यदि नहीं है किसी पर तो कोई
कितनी भी कोशिश कर ले उसपर
विश्‍वास नहीं होता ...

बुधवार, 15 फरवरी 2012

ये बचपन के पल.....














खुशियों का मेला लगता है
बचपन की गलियों में
हर कोई अपने में मस्‍त
फिक्र के साये
दूर खड़े झुंझलाते रहते  हैं बस

................
हर चीज़ बिखरी रहती है
कितना भी समेटो
उसे तो बस  वही चाहिए होता है
जो चीज़ करीने से रखी होती
सोफे के कवर
उसे ज़मीन पर अच्‍छे लगते
खिलौने पलंग पर बिखरे
मस्‍ती का आलम
जिसको देखो मुंह पे उंगली रख
डांट कर चुप करा देती
जब चाहे किसी के कान खींच देती
उसकी तोतली बोली सुन  बड़े भी वही
रोटी को तोती पानी को मम कहते
उसके होने से बचपन लौट आता है
उम्र दूर खड़ी देखती रहती है
ये बचपन के पल ही
बस हर पल सच्‍चे होते है ...

बुधवार, 8 फरवरी 2012

'मैं तो तुम्हारे पास हूँ ...'

मॉं कैसे तुम्‍हें
एक शब्‍द मान लूँ
दुनिया हो मेरी 
पूरी तुम 
ऑंखे खुलने से लेकर 
पलकों के मुंदने तक 
तुम सोचती हो 
मेरे ही बारे में 
हर छोटी से छोटी खुशी 
समेट लेती हो 
अपने ऑंचल में यूँ 
जैसे खज़ाना पा लिया हो कोई 
सोचती हूँ ...
यह शब्‍द दुनिया कैसे हो गया मेरी 
पकड़ी थी उंगली जब 
पहला कदम 
उठाया था चलने को 
तब भी ... 
और अब भी ...मुझसे पहले 
मेरी हर मुश्किल में 
तुम खड़ी हो जाती हो 
और मैं बेपरवाह हो 
सोचती हूँ

मॉं हैं न सब संभाल लेंगी ..... 

मॉं की कलम मेरे लिए .... 

लगता है 
किसी मासूम बच्चे ने
मेरा आँचल पकड़ लिया हो 
जब जब मुड़के देखती हूँ
उसकी मुस्कान में 
बस एक बात होती है
'मैं भी साथ ...'
और मैं उसकी मासूमियत पर 
न्योछावर हो जाती हूँ
आशीषों से भर देती हूँ
कहती हूँ 
'मैं तो तुम्हारे पास हूँ ...'