
रस्म के नाम पर, रिवाज के नाम पर जाने,
कब तक होती रहेगी यूं ही कुर्बान जिंदगी ।
पोछकर अश्क अपनी आंख से पूछती जब,
बेटी मां से क्यों दी मुझे तूने ऐसी जिंदगी ।
मेरा कोई दोष जो मुझे मिला ये कन्या जन्म,
क्या दर्द, और वेदना बनके रहेगी ये जिंदगी ।
तेरी कोख में पली हूं नौ माह मैं भी तो मां,
आ के धरा में करती हूं मैं तेरी भी बंदगी ।
माना की पराई हूं ‘सदा’ से लोग कहते आये,
पीर मेरी समझ ली बिन कहे तुमने दी जिंदगी ।
तिरस्कृत हुई सहा अपमान भी मैने, नहीं छोड़ा,
फिर भी मैने ईश्वर इसे जो मिली मुझे जिंदगी ।
kisne kaha tu dard hai , jisne kaha wah dard tha , ehsaason se alag thalag ek patthar sa jiv tha ... jisne kabhi jana hi nahin ki tumse hi ghar ghar kahlaya...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमार्मिक ... हर पंक्ति में आज का सच लिखा है ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंपर समय बदल रहा है ... और जल्दी ही बदलेगा ...
Wahi Jwalant sawaal hai. Aaj bhee dhadhak rahe hain. BAHUT MAARMIK!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत मार्मिक... दिल को छू गई...
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिल को छूने वाली रचना ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर कविता..बधाई.
प्रत्युत्तर देंहटाएं'पाखी की दुनिया' में भी तो आइये !!
बहुत सुन्दर अच्छी लगी आपकी हर पोस्ट बहुत ही स्टिक है आपकी हर पोस्ट कभी अप्प मेरे ब्लॉग पैर भी पधारिये मुझे भी आप के अनुभव के बारे में जनने का मोका देवे
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिनेश पारीक
http://vangaydinesh.blogspot.com/ ये मेरे ब्लॉग का लिंक है यहाँ से अप्प मेरे ब्लॉग पे जा सकते है
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति एक बेटी के लिए.. बहुत सुन्दर रचना...
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिल को छूने वाली रचना |
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khubsurat blog laga
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://shayaridays.blogspot.com/
बेस्ट ऑफ़ 2011
प्रत्युत्तर देंहटाएंचर्चा-मंच 790
पर आपकी एक उत्कृष्ट रचना है |
charchamanch.blogspot.com